सामाजिक नियोजन
सामाजिक नियोजन के अन्तर्गत कुल चार इकाईयों को सम्मिलित किया गया है। पहली इकाई सामाजिक नियोजन, अवधारणा, उद्देश्य, प्रकार पर आधारित है। इस इकाई में सामाजिक नियोजन की अवधारणा, अर्थ एवं उद्देश्य पर विस्तार से चर्चा की गयी है। सामाजिक नियोजन के प्रकारों पर भी प्रकाश डाला गया हैं इस खण्ड की दूसरी इकाई सामाजिक एवं आर्थिक नियोजन में अन्र्तसम्बन्ध है। इस इकाई में सामाजिक एवं आर्थिक नियोजन के अर्थ अवधारणा को स्पष्ट करने हुये इनके बीच अन्र्तसम्बन्धों पर भी व्याख्या की गयी है। इस खण्ड की तीसरी इकाई भारत में सामाजिक नियोजन की प्रक्रिया पर आधारित है।
इस इकाई में सामाजिक नियोजन का अर्थ, परिभाषा, लक्ष्य, कार्य, नियोजन की प्रक्रिया के चरण, प्रकार्य, आधारभूत, कार्यरिति पंचवर्षीय योजना के निर्माण की प्रक्रिया के चरण पर विस्तार से चर्चा की गयी है। खण्ड की चौथी इकाई सामाजिक नियोजन को प्रभावित करने वाले कारक पर आधारित है। इस इकाई में सामाजिक नियोजन को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ ही साथ सामाजिक नियोजन की सफलता की आवश्यक शर्ते, सफल नियोजन हेतु विचारणीय तथ्यों पर विस्तृत व्याख्या की गयी है।
उद्देश्य
प्रिय ज्ञानार्थियों, प्रस्तुत इकाई में सामाजिक नियोजन के बारे में जानकारी प्रदान की जायेगी। प्रस्तुत इकाई में सामाजिक नियोजन की अवधारणा को स्पष्ट किया जायेगा। साथ ही साथ सामाजिक नियोजन के उद्देश्य एवं प्रकारों के बारे में ज्ञान प्रदान किया जायेगा।
प्रस्तुत इकाई सामाजिक नियोजन के प्रकारों के बारे में भी जानकारी प्रदान करती है तथा बताती है कि सामाजिक नियोजन के कौन-2 से प्रकार प्रचलन में है और इन प्रकारों की अपनी क्या-2 सीमाएं है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप सामाजिक नियोजन की अवधारणा, उद्देश्य एवं प्रकारों से सम्बन्धित अपनी राय प्रस्तुत कर सकेंगे।
परिचय
नियोजन’ शब्द का प्रयोग केवल व्यावसायिक गतिविधियों में नहीं होता है बाल्कि इसका प्रयोग समाज की अन्य गैर व्यवसायिक गतिविधियों के साथ-साथ समाज और व्यक्तियों द्वारा भी किया जाता है। इसी कारण से समाज विज्ञानों में नियोजन अध्ययन का प्रमुख विषय बनता जा रहा है। जिससे वह अपना जीवन संतोषप्रद बना सके और सुख की अनुभूति प्राप्त कर सके। इसीलिए व्यक्ति अपने जीवन के अधिकांश क्षेत्रों में योजनाएं वर्तमान स्थितियों एवं भविष्य की सम्भानाओं को देखकर बनाता है। इस प्रकार नियोजन का तात्पर्य ‘कल के कार्य का आज निर्धारण करना है। समाज में सामाजिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के कारण आज नियोजन व्यवहार का एक मूलभूत एवं आवश्यक अंग बन गया है। वर्तमान समय में बिना नियोजन के किसी भी समाज या व्यक्ति का व्यवस्थित विकास एवं प्रगति नहीं हो सकती है। इसीलिए निम्नलिखित कारणों से नियोजन महत्वपूर्ण हैः
1. नियोजन के द्वारा लक्ष्यों एवं संसाधनों के मध्य पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित किया जाता है कि जिससे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम व्यवस्थित एवं सुचारू रूप से सम्पन्न हो पाते है।
2. अनियोजित व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार स्थापित करते है और इनका अधिकाधिक उपयोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए करता है जबकि नियोजित व्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों से समाज के सभी वर्गों को लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार नियोजित व्यवस्था में उत्पादन एवं लाभों का साम्यपूर्ण वितरण होता है।
3. नियोजित व्यवस्था में नियोजन इस प्रकार किया जाता है कि जिससे समाज के कमजोर एवं निर्बल वर्गों का शोषण न हो।
4. नियोजन के द्वारा सामाजिक विकास से सम्बन्धित सेवाओं का न्यायपूर्ण वितरण होता है।
5. नियोजन द्वारा समाज का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक, संचार, परिवहन आदि से सम्बन्धित क्षेत्रों के विकास के अवसर उपलब्ध होते है।
6. नियोजन द्वारा समाज में इच्छित / नियोजित सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है।
7.
नियोजन के द्वारा समाज के कमजोर, निर्बल एवं शोषित वर्गों को समाज की
मुख्यधारा से जोड़ने वाली योजनाओं एवं सेवाओं का प्रबन्ध किया जाता है जिसके
परिणाम स्वरूप समाज कल्याण में वृद्धि होती है। नियोजन के द्वारा सामाजिक समस्याओं एवं व्याधियों को कम किया जा सकता है। 8. 9
नियोजन द्वारा मॉग एवं पूर्ति, आवयकताओं एवं संसाधनों में समन्वय स्थापित किये जाने का प्रयास किया जाता है जबकि अनियोजित व्यवस्था में बेरोजगारी एवं कीमतों
में वृद्धि होती है जिससे समाज के कमजोर एवं निर्बल वर्गों का शोषण होता है।
10. नियोजन के द्वारा किसी भी संगठन एवं संस्था के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
भारत में नियोजन की प्रक्रिया की आधारशिला स्वतन्त्रतापूर्व 1934 में एम० विश्वेश्वरैया ने रखी। इसके पश्चात् सुभाष चन्द्र बोस के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद 1938 में नियोजन के माध्यम से सामाजिक आर्थिक विकास को प्रोत्साहित के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय नियोजन समिति बनाई गई। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतीय संविधान 1950 में हमारे देश में लागू किया गया था और सामाजिक नियोजन को भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में केन्द्र (संघ) सूची के अन्तर्गत रखा गया है और नियोजन को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया गया है।
FAQ
Q.
A.
निष्कर्ष
हमारे देश में नियोजन के लिए योजना आयोग सर्वोच्च संस्था है जो देश में सभी प्रकार के नियोजन के लिए उत्तरदायी है इसका गठन 15 मार्च 1950 को किया गया था। इसका अध्यक्ष देश का वर्तमान प्रधानमंत्री होता है और 6-7 विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ सदस्य होते है। योजना आयोग संवैधानिक संस्था नहीं है इसलिए वर्तमान केन्द्रीय सरकार योजना आयोग को समाप्त कर नियोजन के लिए दूसरी व्यवस्था/संस्था बनाना चाहती है जिस पर बैठके चल रही है।